मेरे अतीत में जो कुछ भी हुआ
वो सब वापस आ गया… चुपचाप,
जैसे वक़्त ने अपनी किताब खोल दी हो।
मैं एक बार प्यार में गिरा था
जब मुझे पता भी नहीं था
कि प्यार होता क्या है।
और फिर…
मैं दोबारा गिरा
जब मैं समझ चुका था
कि प्यार क्या होता है।
दोनों बार… सच था।
दोनों बार… साफ था।
दोनों बार… दिल से था।
फिर भी दोनों बार… जवाब नहीं मिला।
वही दिल, वही एहसास,
वही दीवानगी, वही इंतज़ार,
वही दूरी
चाहे पास खड़े थे हम।
मैं कह न सका लफ़्ज़ों में,
बस अपनी हरकतों में छुपा दिया।
पर शायद…
वो समझ ही नहीं पाए।
दोनों के लिए दुआ भी की,
दोनों के लिए रोया भी।
वही पागलपन, वही लगाव,
वही खुद को खोना।
सब कुछ वही रहा…
बस लोग बदल गए।
यह कैसा चक्कर है?
क्या तोड़ने आता है मुझे,
या मुझे बनाने?
कभी लगता है दर्द चला जाए,
कभी लगता है इसी दर्द में
थोड़ी सी ज़िंदगी मिल जाती है।
शायद आदत सी हो गई है
इस दर्द की…
क्योंकि यह फिर आ गया
एक नए चेहरे में.
जो खत्म समझा था मैंने
वो फिर से शुरू हो गया…
बिलकुल चुपके से.
वही टूटा हुआ दिल,
वही खामोशी,
ना अलविदा, ना फैसला.
दोनों के दिल में कुछ था मेरे लिए,
पर दोनों ने कभी कहा नहीं.
ऐसा लगता है
मेरी ज़िंदगी का यह हिस्सा
समय में अटका हुआ है…
तब भी हम थे, आज भी हम ही है.
बस फ़र्क़ इतना है
तब मैं समझ नहीं पाया था दर्द,
और अब… समझ कर भी
बस महसूस कर रहा हूँ।
और शायद…
यही ज़िंदगी मुझे सिखा रही है
कि हर प्यार जवाब नहीं होता,
पर हर प्यार इंसान को बदल देता है।
संजी-पॉल अरविंद द्वारा
**मेरी कविताओं के आधार पर मेरे जीवन का आकलन न करें; मेरी कविताएं और मेरा जीवन दो अलग-अलग चीजें हैं।
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